
NOW HINDUSTAN. कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में पारंपरिक सुगंधित धान की खेती को बढ़ावा देने की पहल शुरू हुई है। ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी संजय पटेल के प्रयासों से उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर एवं गोरखपुर क्षेत्र की प्रसिद्ध पारंपरिक धान किस्म ‘काला नमक’ के बीज जिले के किसानों तक पहुंचाए गए हैं। जिले के रुमगरा और रिस्दी गांव में इसकी प्रायोगिक खेती शुरू की गई है।
इस पहल के लिए संजय पटेल ने उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर स्थित पार्टिसिपेटरी रूरल डेवलपमेंट फाउंडेशन (PRDF) के प्रमुख रामचेत चौधरी से संपर्क किया। इसका उद्देश्य प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के साथ कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देना और किसानों को विशिष्ट गुणवत्ता वाली फसलों के माध्यम से बेहतर बाजार अवसर उपलब्ध कराना है।
भगवान बुद्ध से जुड़ी है काला नमक धान की परंपरा
काला नमक धान उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर और गोरखपुर क्षेत्र की प्रसिद्ध पारंपरिक किस्म है। इसकी पहचान गहरे रंग की भूसी, सफेद चावल और विशिष्ट सुगंध से होती है। इस धान से भगवान गौतम बुद्ध से जुड़ी एक लोकमान्यता भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, इस क्षेत्र में भगवान बुद्ध के आगमन और उनके आशीर्वाद से इसका संबंध रहा है। यह परंपरा काला नमक धान को क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती है।
गुणवत्ता और बाजार की संभावनाओं पर नजर
काला नमक चावल अपने विशिष्ट स्वाद, सुगंध और पोषण संबंधी गुणों के लिए जाना जाता है। इसकी बाजार कीमत 300 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम तक होने का उल्लेख किया गया है। हालांकि, वास्तविक कीमत चावल की गुणवत्ता, ब्रांडिंग, बिक्री के माध्यम और बाजार की मांग पर निर्भर करती है। ऐसे में इसकी खेती किसानों के लिए आय के नए अवसर खोल सकती है, लेकिन लाभ का आकलन उत्पादन लागत और स्थानीय बाजार में मांग के आधार पर ही किया जा सकेगा।
रुमगरा और रिस्दी के किसानों ने शुरू किया प्रयोग
कोरबा जिले में इस धान की प्रायोगिक खेती ग्राम रुमगरा के किसान विजय सिंह कंवर एवं शिवकुमार कंवर तथा ग्राम रिस्दी के किसान संजय कंवर द्वारा की जा रही है। इस प्रयोग के जरिए स्थानीय मिट्टी और जलवायु में धान की अनुकूलता, फसल की वृद्धि, उत्पादन क्षमता, सुगंध और गुणवत्ता का आकलन किया जाएगा।
प्रयोग के परिणामों से यह समझने में मदद मिलेगी कि कोरबा जिले की परिस्थितियों में काला नमक धान की खेती कितनी उपयुक्त है और प्राकृतिक खेती की पद्धतियों के साथ इसे किस तरह अपनाया जा सकता है।
सफलता मिलने पर अन्य किसानों तक पहुंचेगी किस्म
संजय पटेल की पहल का उद्देश्य किसानों को परंपरागत धान की खेती के साथ-साथ विशिष्ट गुणवत्ता और बेहतर बाजार मूल्य की संभावना वाली फसलों के लिए भी प्रेरित करना है। यदि रुमगरा और रिस्दी में प्रायोगिक खेती के सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो भविष्य में जिले के अन्य किसानों को भी इस किस्म की खेती से जोड़ने की संभावनाएं बन सकती हैं।
कोरबा में काला नमक धान की यह पहल कृषि विविधीकरण, प्राकृतिक खेती और पारंपरिक धान किस्मों के संरक्षण की दिशा में एक प्रयोग है। इसके परिणाम आने वाले समय में जिले के किसानों के लिए नए कृषि विकल्प विकसित करने में सहायक हो सकते हैं।




