हर चुनाव में बीजेपी के लिए गड्ढा खोदने वाले लखन का… क्या अमित शाह करेंगे हिसाब-किताब, बिकने का है इनका इतिहास

Rajesh Kumar Mishra
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NOW HINDUSTAN. कोरबा। कोरबा विधानसभा की हॉट सीट पर भाजपा ने बिकाऊ लखन लाल देवांगन को अपना प्रत्याशी बनाया है। बिकाऊ इसलिए कि यह सभी जानते हैं कि हर चुनाव में लखनलाल अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी के लिए गड्ढा खोद देते हैं। हम आपको थोड़ा सा पीछे ले चलते हैं, लोकसभा में ज्योतिनंद दुबे को टिकट मिला। यह सभी जानते हैं की ज्योतिनंद और लखन लाल की आपस में नहीं बनती। लखन लाल ने ज्योतिनंद के लिए गड्ढा खोदा। वह कोरबा विधानसभा से आगे रहे। लेकिन तब लखनलाल 5 साल कटघोरा की विधायकी कर चुके थे। ज्योति नंद की खुलकर खिलाफत की, जिसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा। भाजपा, कटघोरा से पिछड़ गई। कोरबा लोकसभा से भाजपा मोदी को एक सीट दे सकती थी। लेकिन लखन लाल के कारण यह संभव नहीं हुआ। विधानसभा चुनाव में भी जोगेश लांबा और विकास महतो का अलग-अलग गुट है। 2013 में जब लांबा को टिकट मिला था। तब लखन लाल ने इनके लिए भी गड्ढा खोदा। अपने समर्थकों से कह दिया कि जोगेश लांबा को चुनाव हराना है। तब भी उन्होंने विरोधियों से हाथ मिलाया और बिक गए। इसी तरह जब 2018 में विकास महतो को टिकट मिला तब भी लखनलाल ने साथ नहीं दिया। संगठन को लेकर पूरे चुनाव से गायब रहे। कई इलाकों में गड्ढा खोदा। जिसका परिणाम यह हुआ कि विकास महतो भी चुनाव हार गए। अब ऐसे प्रत्याशी को भाजपा ने मैदान में उतार दिया है।

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यह बात सभी जानते हैं कि नगर पालिका निगम कोरबा में भाजपा पार्षदों की संख्या अधिक है। लेकिन फिर भी महापौर कांग्रेस का बन गया। कांग्रेस के महापौर ने केवल एक वोट से महापौर का चुनाव जीत लिया। निर्वाचित पार्षदों को ही महापौर के लिए मतदान का अधिकार मिला। लखन के भाई नरेंद्र देवांगन पार्षद हैं। तभी से यह सवाल कायम है कि आखिर यह कैसे हुआ। लखन लाल का इतिहास बिक जाने का रहा है। ऐसे बिकाऊ और भोली सूरत के पीछे दोहरे चरित्र वाले नेता को भाजपा ने प्रत्याशी बना दिया है।

*क्या अमित शाह लेंगे बीजेपी के दोहरे चरित्र का संज्ञान* :

लखनलाल के बिकाऊ चरित्र के साथ ही भाजपा का दोहरा चरित्र भी सबके सामने है
कुछ समय पहले भाजपा का जिलाध्यक्ष राजीव सिंह ने बालको के खिलाफ चरणबद्ध आंदोलन का ऐलान किया था। कहा था कि बालको के खिलाफ जमकर प्रदर्शन करेंगे। ज्ञापन सौंपा बिंदुवार मुद्दे उठाए, मंत्री रहते जयसिंह अग्रवाल ने बालको को घेरा दौरा किया। बालको की पोल खोली अधिकारियों को जांच के आदेश भी दिए। लेकिन राजीव सिंह ने अपना आंदोलन वापस ले लिया। तब भी लखन उनके साथ कदमताल कर रहे थे। आखिर राजीव सिंह और लखन की कौन सी मजबूरी थी, जिसकी वजह से उन्होंने आंदोलन वापस ले लिया।
इसे जनता देख रही है। क्या सेटिंग हुई यह सवाल पूछ रही है। इसे लेकर क्षेत्र की जनता में कई चर्चाएं हैं। युवाओं में आक्रोश है। बेरोजगारी का मुद्दा हो या संगठन का नेतृत्व। हर मोर्चे पर भाजपा फेल रही है। सवाल यह है कि क्या अब अमित शाह कोरबा आने के बाद इन सभी मामलों का संज्ञान लेंगे। क्या वह मरे हुए संगठन को आड़े हाथ लेंगे,देखना दिलचस्प होगा।

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