कृषि विभाग के उप संचालक ने किसानों को अपने खेतों पर पैरा नहीं जलाने की अपील की……

Rajesh Kumar Mishra
4 Min Read
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.14 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.13 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.14
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.12
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.12 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.13
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.12 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.13 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.14 (1)
NOW HINDUSTAN कोरबा/गरियाबंद 31 मई 2024  ग्रीष्म कालीन धान के फसल लेने वाले कृषकां द्वारा धान कटाई के उपरांत शेष बचे फसल अवशेषों जैसे नराई एवं पैरा को खेत में जला दिया जाता है। जिससे मृदा, पर्यावरण एवं मनुष्यों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कृषकों द्वारा पराली न जलाने एवं पराली के प्रबंधन के संबंध में कृषि विभाग द्वारा फिंगेश्वर विकासखंड के विभिन्न ग्रामों में किसानों की बैठक लेकर पराली न जलाने के बारे में समझाइश दी जा रही है।
कृषि विभाग के उप संचालक चंदन राय  के निर्देश में अनुविभागीय कृषि अधिकारी श्रीमती सीमा करचाम द्वारा ग्राम बोरसी, कोमा, अरण्ड एवं पोखरा में किसानों को पराली न जलाने के संबंध में अपील करते हुए कहा कि पराली जलाने की वजह से जहां एक तरफ प्रदुषण की समस्या बढ जाती है, तो वही दूसरी तरफ इसकी वजह से जमीन बंजर होने लगती है। जमीन के बंजर होने का सीधा असर किसानो की आमदनी पर पड़ता है। किसानों के द्वारा हर साल पराली जलाने की वजह से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा में कमी आ रही है, अगर मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा में ज्यादा कमी होगी तो मिट्टी बंजर भी हो सकती है तथा किसानों द्वारा प्रयोग किये जाने वाले रासायनिक खाद भी फसलों पर काम करना बंद कर हो जायेगा।
जिससे फसल उत्पादन में विपरित प्रभाव पड़ेगा। पराली जलाने से मिट्टी का तापमान अत्यधिक बढने  के कारण हमारे मित्र जीव जैसेः- केचवा व अन्य लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाता है तथा खेत में उपलब्ध पोषक तत्व जैसेः- नत्रजन, सूक्ष्म तत्व, आर्गेनिक कार्बन आदि का ह्रास होता है। जिसके कारण मिट्टी की उर्वराशक्ति कम होता है। मिट्टी कठोर होने के कारण हलों से जोताई करने में समस्या उत्पन्न होती है। मिट्टी के कठोर होने के कारण पौधों के जड़ों का विकास सूचारू रूप से नही हो पाने के कारण उत्पादन पर असर पड़ता है। पराली जलाने से उत्पन्न धुएं से वातावरण के साथ-साथ मनुष्यों के स्वास्थ्य पर भी उसका कुप्रभाव पड़ता है। कृषक भाईयों से अपील है कि पराली न जलाकर उसके प्रबंधन हेतु फसल कटाई के उपरांत खेत में बचे फसल अवषेश, घास फुस, पत्तियां व ठूंठ आदि को सड़ाने के लिए फसल काटने के बाद 20 से 25 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर डिस्क हैरो या रोटावेटर से मिट्टी में मिला देना से फसल अवषेश जल्दी सड़कर खाद के रूप में बदल जाता है। फसल अवषेश को सड़ाने वाले फफूंद ट्रायकोडर्मा कैप्सूलके 4 से 5 कैप्सूल व वेस्ट-डी कम्पोजर को 200 से 300 लीटर पानी में घोलकर सीधा फसल अवषेशां पर छिड़काव कर फसल अवषेष को खाद के रूप में बदल सकते है। ट्रायकोडर्मा कैप्सूल व वेस्ट-डी कम्पोजर प्राप्त करने के लिए किसान भाई कृषि विज्ञान केन्द्र गरियाबंद व इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में संपर्क कर सकते है।
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.06 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.07 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.06 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.06
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.07
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.08 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.07 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.08 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.09 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.43.08
Share This Article