NOW HINDUSTAN. Bihar News-कालिदास द्वारा रचित अभिज्ञानशाकुंतलम् भारतीय समाज एवं वैवाहिक मूल्य का एक अनुपम कृति है। यह साहित्य की मूल्यवान रचना ही नहीं बल्कि प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी, पिता-पुत्री एवं मित्रों के रिश्तों का वह विश्वास की डोर समेटे हैं जो किसी विकट परिस्थिति में बिखरता नहीं है। दुष्यंत और शकुंतला का प्रेम विवाह जो दुर्वासा ऋषि के श्राप के बाद भी टूटता नहीं बल्कि पुनर्मिलन से भारतीय समाज में सभी के लिए आदर्श स्थापित करता है। शादी के बाद दुष्यंत द्वारा गर्भवती शकुंतला को पहचानने से इनकार कर दिया जाता है। फिर भी शकुंतला क्रोधित नहीं होती है। वह इतनी सक्षम है कि दुष्यंत को राज पाठ समेत नष्ट कर सकती है बल्कि वह उचित समय की प्रतीक्षा करती है। शकुंतला भाग्य को कोसती है परंतु ऐसा कोई कदम नहीं उठाती है जिससे उसके ससुराल पक्ष का नाश हो। उचित समय आने पर दुर्वासा ऋषि का श्राप समाप्त हो जाता है। दुष्यंत पुनः शकुंतला को पुत्र समेत अपना लेता है और अपनी गलती पर पश्चाताप भी करता है।
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आज भारतीय समाज के संदर्भ में अभिज्ञानशाकुंतलम की प्रेम कहानी आदर्श एवं मार्गदर्शक हैं। वर्तमान समय में भारतीय समाज में बढ़ती तलाक की प्रवृत्ति एवं अलगाव एक विकट रूप धारण करता जा रहा है। पहले यह प्रवृत्ति केवल महानगरों में देखने को मिलता था लेकिन अब छोटी-छोटी बातों पर पति-पत्नी का रिश्ता अदालत पहुंच जाता है परिणाम स्वरुप बाद में पछताने के सिवा कुछ नहीं मिलता है। इसलिए हमें शकुंतला के चरित्र से सीख लेते हुए धैर्य, सहनशीलता एवं निष्ठा को धारण कर वैवाहिक जीवन में आने वाली समस्याओं को दूर कर सफल वैवाहिक जीवन जी सकते हैं। नाटक के एक दृश्य में जब विवाह के पश्चात शकुंतला अपने पति के घर जाने के लिए प्रस्थान करती है तब शकुंतला के पालक पिता ऋषि कण्व शिक्षा देते हैं पुत्री जब आप अपने पति के घर जाएंगे तब वहां अपने से बड़ों को सम्मान एवं छोटे को स्नेह देना। कभी भी किसी बात के लिए अपने पति को ताना नहीं देना, ससुराल में कभी अपने नैहर की बड़ाई या तुलना नहीं करना एवं अपने गहने को दिखाकर अभिमान न करना। पिता द्वारा दी गई शिक्षा को अपने जीवन में धारण करना इससे तुम्हारा दांपत्य जीवन सुखी रहेगा।नहीं तो कष्टदायक बन जाएगा।
आज भारतीय समाज में विवाह के पश्चात ऋषि कण्व द्वारा दी गई शिक्षा केवल शकुंतला के लिए नहीं बल्कि उन सभी नव विवाहित जोड़ों के लिए हैं। जब स्त्री ससुराल में पति को ताना, अपने नैहर का बखान करना, अपने जेवर के प्रदर्शन को दिखाती है तो जीवन में कड़वाहट भर जाता है सभी माता-पिता को विदाई के समय अपने पुत्री को ऋषि कण्व द्वारा दी गई शिक्षा को देकर विदा करना चाहिए एवं पुत्री के ससुराल में अनावश्यक दखलंदाजी से बचना चाहिए। सभी माता-पिता को अपने पुत्रवधू को बहू नहीं बल्कि बेटी के रूप में स्वीकार करना चाहिए। कालीदास द्वारा रचित नाटक अभिज्ञानशकुंतलम् एक सफल वैवाहिक जीवन की प्रेरणा है एवं भारतीय वैवाहिक संस्था को मजबूत बनाने के लिए अनुकरणीय है।
संवाददाता राजेन्द्र कुमार

