
NOW HINDUSTAN छत्तीसगढ़ में आने वाला नया साल चुनावी रहेगा। पहले मई- जून तक लोकसभा के चुनाव होंगे। इसके बाद दिसंबर से अंत तक नगरी निकायों के चुनाव होंगे। खास बात यह है कि इस बार के नगरी निकाय चुनाव से पहले कई नियमों में बदलाव हो सकता है। एक बार फिर महापौर चुनने का अधिकार जनता को मिल सकता है। प्रशासनिक हल्को में इसकी कवायद भी शुरू हो गई है । हालांकि अधिकारी अभी कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। उनका कहना है कि इसका फैसला कैबिनेट की बैठक में होगा। वर्तमान में महापौर चुनने का अधिकार पार्षदों के पास है। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2018 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस ने निकाय चुनाव के नियमों में बदलाव किया था। महापौर चुनने का अधिकार जनता से वापस लेकर पार्षदों को दे दिया गया था । यानी पार्षदो को यह मिलकर तय करना था कि कौन महापौर और कौन सभापति बनेंगे । नियम में बदलाव से पहले तीन सदस्य मंत्रिमंडल उप समिति का गठन किया गया था । समिति की सिफारिश की आधार पर चुनाव प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया गया था। इससे पहले नगरी निकाय चुनाव में प्रत्यक्ष प्रणाली के आधार पर चुनाव हुए थे । विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने इसका खुलकर विरोध किया था। इसके खिलाफ भाजपा राज्य भवन तक पहुंची थी। साथ ही सड़क पर उतरकर प्रदर्शन भी किया था। इसके बावजूद अप्रत्यक्ष प्रणाली से निकाय चुनाव हुए। सभी नगर निगम में कांग्रेस के महापौर का कब्जा हुआ । नगर पालिकाओं की भी यही स्थिति रही थी।
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने मतदान की प्रक्रिया में भी बदलाव किया था। ईवीएम के आने के बाद छत्तीसगढ़ में नगरी निकाय के चुनाव इसी के जारी होते थे। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ईवीएम की जगह बैलेंट पेपर से चुनाव कराने का फैसला लिया था। वर्ष 2019 में निकाय चुनाव बैलट पेपर के जारी हुआ था। छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद माना जा रहा है कि आगामी निकाय चुनाव ईवीएम से ही हो सकता है। जानकारों का कहना है कि ईवीएम की तुलना में मतपेटी से चुनाव कराना कम खर्चीला होता है। हालांकि यह होता है तो विपक्ष की होने के नाते कांग्रेस इसका खुलकर विरोध करेगी। विधानसभा चुनाव होने के बाद भी ईवीएम को लेकर कांग्रेस की तरफ से विरोध के स्वर सामने आए हैं ।
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