
NOW HINDUSTAN प्रयागराज से विराजे श्री श्रीमज्ज जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी घनश्यामाचार्य जी श्री शिव महापुराण कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने बताया कि दक्ष प्रजापति की सभी पुत्रियां गुणवान थीं। फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे कि उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो जो सर्वशक्ति संपन्न एवं सर्व विजयी हो।वे ऐसी पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा कि मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। दक्ष ने तप करने का कारण बताया तो मां बोली मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करुंगी। मेरा नाम होगा सती और मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करुंगी। भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया और वो सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थी। बाल्य अवस्था में ही ऐसे अलौकिक आश्चर्य चकित करने वाले कार्य कर दिखाए कि जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी आश्चर्य हुआ। जब सती विवाह योग्य हो गई तो दक्ष को उसके लिए वर की चिता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श लिया तो ब्रह्मा जी ने कहा कि सती आद्या की अवतार है। आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। उसके विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया और सती ने कैलाश में भगवान के साथ खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत किया। साफ है कि शिव जी की पूजा से वे खुद को ही सौंप देते हैं
मुख्य यजमान दशरथ शर्मा कुशुम शर्मा
श्री रामचरितमानस महिला समिति सडा कालोनी
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