छोटे खातेदार और अर्जन के बाद जन्म के प्रकरणों में हाईकोर्ट के फैसले का पालन करे एसईसीएल…..

Rajesh Kumar Mishra
Rajesh Kumar Mishra
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NOW HINDUSTAN. Korba. एसईसीएल में भू-अर्जन के एवज में रोजगार की मांग करते थक चुके विस्थापित बेरोजगारो के पक्ष में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के ताजा निर्णय आने से भूविस्थापितों की आस जगी है । उच्च न्यायालय ने सराईपाली परियोजना और दीपका परियोजना के अलग अलग केस की सुनवाई करते हुए भूविस्थापितों के पक्ष में निर्णय दिया है जिसमे छोटे खातेदारों और भूअर्जन के बाद जन्म लिए अभ्यर्थियों को रोजगार देने का आदेश जारी किया गया है ।

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ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने एसईसीएल से उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए तत्काल रोजगार उपलब्ध कराने की मांग किया है । उन्होंने अपने बयान में बताया है कि कोरबा क्षेत्र की सराईपाली ओपन कास्ट माइन के लिए वर्ष 2007 में राज्य सरकार के द्वारा ग्राम बूड़बूड़ की 856 खातेदारों की भूमि का अर्जन किया गया था और एसईसीएल द्वारा उक्त समय मे प्रचलित मध्यप्रदेश/छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति के तहत हर खातेदार के एक वारिस को रोजगार उपलब्ध कराने पर सहमति प्रदान की गई थी किंतु बाद में कोल इंडिया पालिसी 2012 के अनुसार 2 एकड़ में एक नौकरी लागू कर छोटे खाता धारकों को रोजगार से वंचित कर दिया जिसके खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़ी गयी साथ ही उच्च न्यायालय में रीट पिटीशन दायर किया गया था जिसकी सुनवाई करते हुये माननीय उच्च न्यायालय ने तत्कालीन समय मे विद्यमान पुनर्वास एवं पुनर्वासन नीति के नियम का पालन करते हुए सभी खाते में रोजगार दिए जाने का आदेश जारी किया है और 45 दिनों में रोजगार उपलब्ध कराने का निर्णय दिया है ।

कोर्ट ने कहा है कि अर्जन के समय लागू नीति का बाद में परिवर्तन होने से उनका अर्जित अधिकार समाप्त नही होगा । भूविस्थापितों को पुनर्वास और रोजगार से इनकार करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के साथ साथ अनुच्छेद 21 का उलंघन है । इसी तरह से दीपका परियोजना में अर्जित भूमि के एवज के रोजगार की मांग को एसईसीएल प्रबन्धन द्वारा अर्जन के बाद जन्म लेने के कारण रोजगार देने से इनकार कर दिए जाने के कारण कोर्ट की शरण मे जाने के उपरांत हाई कोर्ट ने निर्णय दिया है जिसमे पूर्व में कोर्ट के अपने ही निर्णय को अलग बताते हुये कहा है कि एसईसीएल द्वारा ने 1984-85 में अर्जन के बाद स्वयं से रोजगार के लिए आमंत्रित नही किया और वर्ष 2015 -16 में रोजगार की मांग पर हुये आंदोलन के बाद रोजगार के लिए ऑफर किया उक्त समय मे खातेदार ने अपने पुत्र को रोजगार की मांग किया था न्यायालय में याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत समाचार पत्रों की विज्ञापन एवं कुसमुंडा क्षेत्र में अर्जन के बाद जन्म लिए 11 लोंगो को रोजगार प्रदान करने का साक्ष्य प्रस्तुत किया जिसके आधार पर उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को रोजगार देने की आदेश जारी किया है ।

श्री कुलदीप ने आगे कहा है कि एसईसीएल रोजगार,मुआवजा और पुनर्वास के मामलों को लटकाए रखती है जिसके कारण भूविस्थापित आंदोलन करने के लिए बाध्य होते हैं ,अभी भी 30 साल पुराने अर्जन के इन्ही मामलों में रोजगार लंबित है जिसके कारण भूविस्थापितों को अपने अधिकार को पाने के लिए भटकना पड़ रहा है और दूसरी ओर जमीन नही होने का हवाला देकर आंदोलन को दबाने के लिए शासन की मदद लेकर झूठे केस बनवाया जा रहा है । उन्होंने बताया कि एसईसीएल मनमाने तरीके से अपनी नफा नुकसान के हिसाब से नीतियों को लागू करती है जिससे अपनी पुरखो की जमीन खोने वाले किसानों के साथ अन्याय हो रहा है । रोजगार और बसाहट के बाद अब मुआवजा वितरण में भी कटौती किया जाने लगा है । कोर्ट के फैसले को लागू कराने , बसाहट के लिए सभी एरिया के लिए समान यूनिफार्म लागू कराने , परिसम्पत्तियों के मुआवजा में कटौती बंद कर केंद्रीय मूल्यांकन बोर्ड के गाइड लाइन के अनुसार मुआवजा सहित अन्य मांग पर मार्च महीने के अंत मे एसईसीएल मुख्यालय बिलासपुर का घेराव किये जाने की तैयारी की जा रही है जिसमे एसईसीएल के सारे क्षेत्रों से हजारों भूविस्थापित शामिल होंगे ।

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