NOW HINDUSTAN. Korba. पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के सहयोग से 46वीं वार्षिक सम्मेलन (इतिहास और संस्कृति सोसायटी – HCS), 55 वीं वार्षिक सम्मेलन (भारतीय पुरातत्व सोसायटी – IAS) और 50 वीं वार्षिक सम्मेलन (भारतीय समाज प्रागैतिहासिक और चतुर्थक अध्ययन – ISPQS ) का भव्य आयोजन 07 से 09 मार्च 2025 तक किया गया। इस तीन दिवसीय सम्मेलन का मुख्य विषय “छत्तीसगढ़ और इसके आस-पास के क्षेत्र की पुरातत्वविद्या ” है, जिसमें देशभर से प्रतिष्ठित पुरातत्वविदों, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं भाग लिया।
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इस सम्मेलन में कुल 280 विद्वानों ने अपने शोध पत्रों का वाचन किया। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में अमेरिका से दो , कोरिया से एक और श्री लंका से तीन विद्वानों ने भी अपना शोध पत्र वाचन किया। सम्मेलन का उद्देश्य छत्तीसगढ़ और इसके आसपास के क्षेत्र की पुरातात्विक धरोहरों का अध्ययन, संरक्षण और संवर्द्धन करना था।
07 मार्च 2025 को हुए उद्घाटन समारोह में डॉ. बी.आर. मणि, महानिदेशक, राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली ने मुख्य अतिथि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस अवसर पर श्री के.एन. दीक्षित (पद्मभूषण), महासचिव, भारतीय पुरातत्व सोसायटी एवं HCS, नई दिल्ली, प्रो. पी.पी. जोगलेकर, सचिव, भारतीय समाज प्रागैतिहासिक और चतुर्थक अध्ययन, डॉ. भुवन विक्रम, क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय क्षेत्र, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भोपाल, प्रो. राजीव प्रकाश, निदेशक, IIT भिलाई, प्रो. राजेश लाल मेहरा, माननीय अध्यक्ष, मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग एवं प्रो. सच्चिदानंद शुक्ल, कुलपति, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर ने विशिष्ट अतिथि के रूप में शिरकत की।
इस दौरान, प्रो. सच्चिदानंद शुक्ल ने अध्यक्षीय भाषण प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ की पुरातात्विक संपदा पर प्रकाश डाला और इस क्षेत्र में और अधिक शोध की आवश्यकता को रेखांकित किया। उद्घाटन समारोह के समापन पर डॉ. शैलेन्द्र कुमार पटेल, रजिस्ट्रार, PRSU, रायपुर ने सभी आगंतुकों और अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
सम्मेलन के दौरान कई महत्वपूर्ण अकादमिक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें प्रख्यात विद्वानों ने अपने विचार और शोध प्रस्तुत किए। प्रो. एच. डी. सांकलिया स्मृति व्याख्यान डॉ. अरुण कुमार (रायपुर) द्वारा दिया गया, जिसमें उन्होंने पुरातात्विक अनुसंधान में नई खोजों और तकनीकों पर प्रकाश डाला। राय बहादुर डॉ. हीरालाल स्मृति व्याख्यान डॉ. आलोक त्रिपाठी (अपर महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें भारतीय पुरातत्व के समकालीन परिप्रेक्ष्य की चर्चा हुई। इसके अलावा, डॉ. एस.पी. गुप्ता स्मृति व्याख्यान डॉ. वसंत शिंदे (भटनागर फेलो, CSIR, केंद्रीय कोशिकीय और आणविक जीवविज्ञान संस्थान, हैदराबाद) द्वारा दिया गया, जिसमें उन्होंने दक्षिण एशिया में प्रागैतिहासिक अध्ययन की दिशा और संभावनाओं पर प्रकाश डाला। इसके अतिरिक्त, डॉ. ए. पी. जमखेडकर, पूर्व कुलपति, डेक्कन कॉलेज, पुणे ने विशेष व्याख्यान प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने भारतीय पुरातत्व में नए खोजों और अनुसंधानों की भूमिका पर चर्चा की।
सम्मेलन में संस्कार भारती छत्तीसगढ़ के कला धरोहर विधा के प्रांतीय संयोजक और जिला पुरातत्व संग्रहालय कोरबा में मार्गदर्शक पद पर कार्यरत हरि सिंह क्षत्री द्वारा कोरबा जिले में लगातार आदिमानवों की चित्रित शैलाश्रयों की एवं अन्य पुरातात्विक महत्व के क्षेत्रों और पुरानिधियों को सन् 2007 से लगातार खोज करते आ रहे हैं। उनके द्वारा भी कोरबा जिले में उनके द्वारा खोजे गए खोखड़ी झरिया शैलाश्रय एवं अन्य शैलाश्रयों के ऊपर अपना शोध पत्र वाचन किया गया। ये उत्खचित शैल चित्र ताम्र पाषाण के हैं। यह सम्मेलन में आये विद्वानों ने भी स्वीकार किया है। यह न केवल कोरबा जिले के लिए गौरव की बात है वरन छत्तीसगढ़ राज्य के लिए भी गौरव की बात है। ऐसे चित्र आमतौर पर धरातल पर पाये जातें हैं परंतु हरि सिंह क्षत्री द्वारा खोजे गए चित्र शैलाश्रयों के दीवारों पर मिल रहें हैं जो अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। जिनके संरक्षण किए जाने पर भी सम्मेलन में आये विद्वानों ने पहल करने की बातें कही। उनके खोजें अत्यंत ही सराहनीय है। सभी ने उनके खोजों के लिए उन्हें बधाई दी।
सम्मेलन के दौरान सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें विश्वविद्यालय के छात्रों ने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं। लोकनृत्य, लोकगान और नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाया गया, जिसे प्रतिभागियों ने अत्यंत सराहा।

