NOW HINDUSTAN. Korba. लाख की खेती एक ऐसी खेती है, जिसमें विशिष्ट प्रकार के कीड़ों (लाख कीट) को पेड़ों पर पाला जाता है, जिससे वे एक प्राकृतिक राल या गोंद (लाख) का स्राव करते हैं। यह एक फसल के रूप में मानी जाती है क्योंकि यह एक व्यावसायिक उत्पाद है जिसका उपयोग विभिन्न उद्योगों में किया जाता । जिसमें **केरिया लैक्का** (Laccifer lacca) नामक कीटों द्वारा उत्पादित प्राकृतिक राल (लाख) का उत्पादन किया जाता है। यह कीट पलाश, कुसुम, बेर, खैर, अरहर, शीशम जैसे पेड़ों पर पनपता है और अपने शरीर से राल स्रावित करता है, जो सूखने पर लाख बनता है। यह राल विभिन्न उद्योगों में उपयोगी है, जैसे चूड़ियां, वार्निश, पॉलिश, विद्युत कुचालक, सौंदर्य प्रसाधन, और दवाइयों की कोटिंग में।
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*लाख की खेती का समय और प्रकार *
फसलें : लाख की दो मुख्य फसलें होती हैं:
1.कतकी-अगहनी (जून-जुलाई में बीज बैठाना, जनवरी-फरवरी में कटाई)
2.बैसाखी-जेठवी (अक्टूबर-नवंबर में बीज बैठाना, जून-जुलाई में कटाई)
*प्रकार*
– कुसुमी लाख : कुसुम के पेड़ों पर उगाई जाती है, उच्च गुणवत्ता वाली।
– रंगीनी लाख : पलाश और बेर के पेड़ों पर, अधिक मात्रा में उत्पादन।
– उत्पादन : एक पेड़ से सालाना 500 रुपये तक का लाख प्राप्त हो सकता है, और बीज से 2.5-3 गुना कच्चा लाख मिलता है। जिसे 700 से 800 रुपए किलो के भाव से बेचा जाता है।

*खेती की प्रक्रिया*
1.पेड़ों का चयन : कुसुम, पलाश, बेर जैसे मेजबान पेड़ों का चयनकिया जाता है कुछ लोग आम के पेड़ पर भी लाख की खेती करती है।
2. बीज बैठाना : लाख कीट युक्त टहनियों (बीहन लाख) को पेड़ की शाखाओं पर बांधा जाता है।
3. कीट प्रबंधन : कीट शिशुओं का पेड़ों पर फैलाव और राल स्रावण।
4. कटाई : परिपक्व होने पर टहनियों से लाख खुरचकर निकाला जाता है और छायादार स्थान में सुखाया जाता है।
*लाभ*
*आर्थिक : कम पूंजी में उच्च मुनाफा। उदाहरण: छत्तीसगढ़ के किसान जीतराम ने 500 पलाश पेड़ों से डेढ़ लाख रुपये कमाए।
– पर्यावरणीय : पेड़-पौधों का संरक्षण।
– सामाजिक : जनजातीय समुदायों के लिए आय का प्रमुख स्रोत।लाख की खेती कम निवेश में अधिक मुनाफा देने वाली और पर्यावरण-अनुकूल कृषि है, जो विशेष रूप से ग्रामीण और जनजातीय समुदायों के लिए लाभकारी है।
*प्रमुख उत्पादक क्षेत्र**
– झारखंड : देश का 54.6% लाख उत्पादन करता है वही छत्तीसगढ़ राज्य ने 2008-09 में 7200 टन उत्पादन के साथ शीर्ष राज्य होने का दर्जा प्राप्त कर लिया है । साथ ही मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा भी अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य है ।
*चुनौतियां*
– सस्ते संश्लिष्ट रेजिन के कारण लाख रंजक की मांग कम हुई।
– उत्पादन लागत को कम करने की आवश्यकता। मौसम की वजह से भी कई बार उत्पाद काम होता है।
*प्रशिक्षण*
भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोंद संस्थान (रांची), वन विभाग, और विश्वविद्यालय (जैसे जवाहर कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर) किसानों को प्रशिक्षण देते हैं।
*सरकारी सहायता : छत्तीसगढ़ में मुफ्त बीज, उपकरण, और सस्ते ऋण।
*इतिहास*
लाख का उपयोग प्राचीन काल से होता है, जैसे महाभारत में लाक्षागृह का उल्लेख। अथर्ववेद और आइन-ए-अकबरी में भी इसका जिक्र है।

