कोरबा में तिरपाल खरीदी पर घमासानः धान उपार्जन केंद्रों में डबल रेट का खेला, जांच हुई तो बड़े नाम होंगे बेनकाब ?

Rajesh Kumar Mishra
Rajesh Kumar Mishra
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NOW HINDUSTAN. Korba. धान खरीदी प्रक्रिया के बीच उठे मूसवा कांड की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि अब तिरपाल (तालपत्री) खरीदी को लेकर नया विवाद सामने आ गया है। आरोप है कि जिले में करीब ६५ धान उपार्जन केंद्रों में भेजी गई 60×60 साइज की तिरपालों के बिल बाजार भाव से दोगुने दर पर बनाए गए हैं। यदि आरोपों की निष्पक्ष जांच हुई तो बड़े स्तर पर जिम्मेदारियों का खुलासा संभव है। पड़ताल में सामने आया है कि संबंधित धान खरीदी सोसायटियों को जिला सहकारी

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केंद्रीय बैंक, कोरबा की ओर से तिरपालें भेजी गईं। इनके साथ मारुति ट्रेडर्स, किशन एग्रो, एम/एस समृद्धि और मां दुर्गा (रायपुर व दुर्ग) के नाम से बिल तथा अलग-अलग जिलों के कोटेशन की प्रतियां भी संलग्न थीं। समिति प्रबंधकों का कहना है कि प्रत्येक तिरपाल का बिल लगभग १०,५०० से १२००० रुपये बनाया गया, जबकि स्थानीय बाजार और रायपुर में इसी साइज की तिरपाल ५,५०० से ६,००० रुपये में उपलब्ध है।

नाम न छापने की शर्त पर एक सहकारी सेवा समिति प्रबंधक ने बताया कि प्रत्येक धान खरीदी केंद्र में कहीं चार कहीं दस तिरपाल भेजी गईं, जिनकी कुल कीमत ५५ हजार से लाखों रुपये दर्शाई गई है। आरोप है कि बैंक की ओर से भुगतान के लिए दबाव बनाया जा रहा है। यदि बाजार दर और बिल राशि का अंतर देखा जाए तो प्रति केंद्र हजारों रुपये का फर्क सामने आता है, जो ६५ केंद्रों में मिलाकर लाखों रुपये तक पहुंच सकता है।

तिरपाल का उद्देश्य बारिश के दौरान धान को सुरक्षित रखना है, लेकिन खरीद प्रक्रिया और मूल्य निर्धारण पर उठे सवालों ने पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जीएसटी सहित ५ से ६ हजार रुपये की लागत वाली सामग्री का बिल १२ हजार रुपये तक दर्शाए जाने के आरोप गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करते हैं। मामले में आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।

हालांकि, जानकारों का कहना है कि यदि जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग निष्पक्ष जांच कराते हैं तो खरीद प्रक्रिया, कोटेशन चयन और भुगतान अनुमोदन की परतें खुल सकती हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या तिरपाल खरीदी की इस कथित धांधली पर ठोस कार्रवाई होगी या मामला भी अन्य विवादों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

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